Monday, November 10, 2014

चिठ्ठी आई है......चलिये राम बारात......

चिठ्ठी आई है......चलिये राम बारात......

अयोध्या से लगभग 56 किमी दूर एक गाँव के रहने वाले हमारे अपने  बाऊ सा सत्यप्रकाश सिंह आज उनके सानुरोध निमंत्र्ण से मैं   अभिभूत हूँ, और जैसा उन्होंने बताया उससे हर किसी का अभिभूत होना स्वाभाविक है।  प्रसंग है राम बारात में शामिल होने का।

अयोध्या में जबर्दस्त उत्साह का माहौल है,  उत्साह और मस्ती का ऐसा जनसैलाब हर पाँचवे साल उमड़ता है जब सीता माता के मायका जनकपुर से हल्दी लगी पीली चिट्ठी यहाँ आती है। और इसके साथ ही राम और सीता के वैवाहिक रस्म रिवाज के कार्यक्रमों की शुरुवात हो जाती है। सारा अयोध्या विवाह की तैयारियों में जुट जाता है।  सब को एक ही सवाल का जूनून है राम बारात कब निकलेगी? 

महाराज दशरथ की नगरी के लोग राम बारात के उत्साह से लबरेज हैं। इस बार जनकपुर से 16 नवम्बर को पीली चिट्ठी आयेगी और 17 नवम्बर को महिलायें मंगल गीत गायेंगी और राम बारात गाजे बाजे के साथ शुभ मुहूर्त में जनकपुर के लिये प्रस्थान करेगी। विवाह के जलसे में इस बार उत्साह इसलिये अधिक है चूँकि बाराती के रूप में नरेन्द्र भाई मोदी भी शामिल होंगे।

जनकपुर नेपाल में भी राम बारात के स्वागत की जोरदार तैयारियां चल रहीं हैं।  हर पांचवें वर्ष होने वाले आयोजन में नेपाल सरकार पलक पांवड़े बिछाए राम बारात की बकायदा आवभगत करती है।  विवाह की सारी रस्में होती है समधी मिलन, रामकलेवा होता है और इसके साथ ही होती है बड़े ही गमगीन माहौल में बेटी सीता की बिदाई। यदि आप राम-सीता के विवाह का साक्षी होना चाहते हैं और राम बारात का लुत्फ़ उठाना चाहतें है बाऊ साब को आपकी प्रतीक्षा है.....

Tuesday, November 4, 2014

आऊटिंग में रामकथा का जलप्रपात

आऊटिंग में रामकथा का जलप्रपात

कोरबा के दूरस्थ वनवासी अंचल देवपहरी में सहपरिवर चलने का मित्र ने फोन पर न्योता दिया मैंने सहर्ष सहमति दे दी।  दरअसल मित्र के गुरूजी आचार्य श्री धर्मेन्द्र जी महाराज की वहाँ रामकथा चल रही है।  मै अवाक् रह गया विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक और फायर बांड नेता पहुँच विहीन आदिवासी इलाके में कथा वाचन कर रहें हैं!

बकौल बनवारी लाल अग्रवाल पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष के आचार्य जी ने स्वयं यहाँ राम कथा बांचने की इच्छा जाहिर की थी।  दरअसल प्रदेश के मुख्यमंत्री जी के साथ वे पिछले दफ़े गोमुख आश्रम में गोशाला के उद्घाटन के सिलसिले में हेलीकाप्टर से आये थे तब यहाँ की प्राकृतिक सुषमा वन क्षेत्र कलकल का निनाद करती सरिता और जलप्रपात देखकर मंत्रमुग्ध हो गये एवम इस अरण्य में राम कथा वाचन का निश्चय किया।

बहरहाल हम सभी नियत स्थान पर एकत्रित हो कर कोरबा जिला अंतर्गत लेमरू वन क्षेत्र के लिए प्रस्थित हुए। बालको से देव पहरी लगभग 50 किलोमीटर है।  बालको नगर से निकलते ही वन प्रान्तर की अनुपम छटा दिखने लगी।  पहाड़ों को काट कर सड़कें बनायी गयीं है।  दोनों और साल के दरख़्त। सघन वन क्षेत्र सूरज की रोशनी भी बहुत कम पहुंच पाती है इस वनांचल में।  पहाड़ी रास्तों को चीरते हमारी गाड़ी ताबड़-तोड़ सतरेंगा पहुंचती है।

सतरेंगा में वन विभाग के बोर्ड ने सहसा हम लोगों का ध्यान खिंचा। इस वन ग्राम में देश का सबसे ऊँचा साल का व्रिक्ष है जिसे महा साल कहा जाता है यह क्षेत्र का अजूबा पेड़ है, साथ ही बांगो परियोजना के बांध का यहाँ अंतिम हिस्सा है।  सूर्य की रश्मियों में बांध के पानी की सतह दर्पण की तरह चमक रही थी।  यहाँ कुदरत को अपलक निहारने के बाद हम देव पहरी के लिए कूंच किये।

हमें महसूस होने लगा की जिस प्रयोजन से हम इतनी दूर आये हैं उससे वंचित न हो जाएँ।  गाड़ी की खिड़की का शीशा खोल दिया गया था।  तीन बजने को है।  आचार्य जी की राम कथा का समय बीता जा रहा है और भूख भी सताने लगी क्या किया जाय मित्रों? तब दुसरे साथी ने कहा- भूखे पेट भजन, होय न गोपाला !! , बोझिलता हटीं हास्य ने हम सबको हलका किया कि बस जल प्रपात की अनुगूँज ने हमें चौकन्ना किया बस भैया यहीं रुका जाये और क्षुदा शांत की जाय।

साथ में लाई गयी चादर चट्टान पर बिछाई गई टिफिन खोला गया और सुस्वादु व्यंजन सज गये।  यह स्थल वन ग्राम देव पहरी का सबसे रमणीक केंद्र है जिसे वन विभाग ने पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित किया हुआ है यह है गोविन्द झुंझ जलप्रपात चोरनई नदी का किनारा। एक और हरीभरी पर्वत मालाये तो दूसरी और सफेद चट्टानों के ऊपर कलकल का निनाद करती नदी की उद्दात्त जलधारा प्रकृति के मनोहारी दृश्य को देखते उठने का दिल नहीं  कर रहा था।  घड़ी को देख मित्र ने कहा अरे! चलो यार टाइम हो गया।

आखिर हम पहुंच गये हिंदुत्व के ध्वजावाहक आचार्य श्री धर्मेन्द्र जी महाराज के कथा स्थल पर।  दिव्य स्वरूप आकर्षक व्यक्तित्व के धनी आचार्यजी के सम्मुख हम अब रामकथा के जल प्रपात से अभिसिंचित होने लगे।  आचार्यजी को सुनना माने समकालीन देशकाल वातावरण की सजीव यात्रा करना है।  कथा भावपूर्ण और जीवंत मीमांसा। आरती कथा विश्राम हम सभी महराज जी से मिलने गोमुखी सेवा धाम परिसर स्थित कुटिया में चले गये। आओ!! आचार्यजी ने वात्सल्य पूर्वक कहा- अरे इतनी दूर चल कर आये हो? मै तो स्वयं पांच को बनारी आ रहा हूँ...फिर मुस्कुराते हुए कहा चलो इस बहाने आउटिंग हो गयी।  हम भी मुस्कुरा रहे थे।  हम तो रामकथा के बहाने आउटिंग पर थे.....ये है शब्दार्थों का जल प्रपात।

Saturday, October 25, 2014

माँ खादी की चादर दे दे...


समाज का अभिजात्य वर्ग जिस खादी को पहिनने में अपनी शान समझता था अब वह खादी विलुप्त होने की कगार पर है।  गाँधी जयंती पर छुट दिए जाने के बावजूद़ अब उसका कोई लेवाल नहीं है।  नेताओं ने भी खद्दर से मुँह मोड़ लिया है।  सही अर्थों में कहा जाय तो खादी को लिनेन के वस्त्र ने निगल लिया।

एक जमाना था जब झक्कास खादी के कपड़े पहना कोई व्यक्ति सामने दिख जाता तो आदर और श्रद्धा से सिर झुक जाता था।  वस्तुत: उन दिनों खादी और चरखा शुचिता, विचार और जनांदोलन का परिचायक था।  वह स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का बोध था। अब तो विशिष्ट लोग बाग लिनेन के महँगे कपड़ों के दीवाने हो गये हैं और इसे ही धारण करने में अपनी शान समझने लगें हैं। अरे! खादी पहिना है? इस खादी के प्रति अब लोगों का दोयम दर्जा हो गया है।

मुझे स्मरण है जब मैं स्कूली छात्र था तब अंचल के सुप्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी महाबीर प्रसाद जी शर्मा, मेरे ताऊ जी के संयोजन में ग्राम शिल्प के ज़रियेे नैला में खादी भंडार खुला था तब वह समाज के शिष्ट वर्ग में आकर्षण का केंद्र हुआ करता था।  जांजगीर तहसील भर के लोग खादी के कपड़ो की खरीदी के लिये यहाँ आया करते।  ग्रामीण क्षेत्र में चरखा केंद्र चलते थे।  दिन भर ग्रामशिल्प द्वारा संचालित खादी भंडार में ग्राहकों और  चरखा केंद्र के स्वयम सेवको की गहमा गहमी रहा करती। इन चरखा केन्द्रों के जरिये लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार मिला हुआ था।

नेताओं और समाज के अभिजात वर्ग की खास पोशाक हुआ करती थी खादी। हम स्कूली बच्चे उन दिनों एक गीत गाया करते थे माँ खादी की चादर दे दे मैं गाँधी बन जाऊँ, सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गाऊं....।दीपावली के पूर्व दो अक्टूबर गाँधी जयंती का खादी प्रेमियों का इंतजार रहता था चूँकि इस दिन से एक माह के लिये खादी के कपड़ों की खरीद पर विशेष छुट हुआ करती है जो आज पर्यन्त जारी है।  पर अब किसी को इस छुट से कोई सरोकार नहीं है।

ऐसा नहीं है कि इस पखवाड़े में कोई खरीददारी नहीं होती।  होती है और जोरदार होती है किन्तु अब लिनन के महंगे वस्त्रों की होती है।  अब नेताओं को आर्थिक आज़ादी स्वदेशी आत्मनिर्भरता जैसे मूल्यों से कोई मतलब नहीं है न ही गाँधी दर्शन से। स्वदेशी विचार अब जमींदोज हो गये लिनन के विदेशी धागों से बने कपड़े लोगों के स्टेट्स सिंबल बन गये! कुटीर उद्योग, गाँव में रोजगार सृजन की चिंता किसे है? लिनन ने निगल लिया अब खादी-चरखा और गाँधी के विचार क्रांति अभियान को।

Wednesday, October 22, 2014

....तो नागदेवता अंधे हो जायेंगे

इस पुरातत्व महत्व के अति प्राचीन मंदिर में गर्भवती महिलाओं का प्रवेश निषेध है. मंदिर के न्यासी मधुकर सातपुते जी ने कारण पूछने पर बताया कि अंचल में लोकमान्यता है कि गर्भवती महिलाओं की दृष्टि से देवालय में प्रतिष्ठापित नागदेवता अंधे हो जायेंगे.

गोड़ आदिवासी नागवंशीय राजाराओं द्वारा निर्मित  श्री भद्रनाग स्वामी देवस्थानम मंदिर ब्रह्मावती महाराष्ट्र में अवस्थित है.  नागों में सर्वश्रेष्ठ शेषनाग का यह मंदिर है परिसर में रखे शिलालेख के अनुसार इसके सभामंढप का जीर्णोद्धार दो हजार साल पहले किया गया था.

संपूर्ण विश्व में यहां एक मात्र नौ फन वाले नागदेवता हैं की प्रतिमा है.  यहां भक्तवृंद दुग्धयुक्त सिंधुर चढ़ाते हैं.  मधुकरजी ने बताया कि सन् १९८० में प्रतिमा से १७ बोरा सिंधुर का कवच निकला तो लोगों को पता चला यह तो ९ फनों वाला नाग है.

विदर्भ अंचल के लोगों में इस मंदिर के प्रति अगाध आस्था और श्रद्धा है.  देवस्थान के न्यासी सातपुते जी के अनुसार अनेकों लोगों को नागदेवता ने दर्शन दिये हैं.

Wednesday, October 8, 2014

चला वाघांच्या साम्राज्यात....

चला वाघांच्या साम्राज्यात....

आये तो चन्द्रपुर थे किंतु हम निकल पड़े जंगल के राजा का साम्राज्य देखने. दरअसल सुबह अखबार पलट कर देखा तो वन्य प्राणियों की खबरों ने हमें ताडोबा-अंधारी टाईगर रिजर्व देखने आकृष्ट किया. पहली खबर थी जंगल से भटक कर गांव व शहर पहुंचे 5 तेंदुए और एक बाघिन भोपाल के उद्यान में भेजे जायेंगे. दूसरी खबर थी समीपस्थ ग्राम लोहारा में विगत कुछ दिनों से बाघ की दहशत के कारण लोगों का जीना हराम हो चुका है. किसान खेतों में जाने से कतराने लगे हैं.  तीसरी खबर थी वन्यजीव सप्ताह के उद्घाटन के संबंध में.  सो हमने अपने निर्धारित सेड्यूल से समय निकाल कर टाईगर रिजर्व की सैर करने की योजना बनाई.

पौ फटते ही हम तैयार हो कर ताडोबा के मेन गेट मोहर्ली की ओर प्रस्थित हुए. अब वन प्रांतर दिखने लगा था.  इनोवा की खिड़की खोलते ही ठण्डी हवा के झोकों ने हमारी आंखों के उनींदेपन को दूर कर दिया. वन मार्ग के दोनों ओर विशाल और हरे भरे पेड़ ऊपर नीले व रक्ताभ आसमान पर सूर्ख लाल सूरज जानों हमें व्याघ्र प्रकल्प की ओर से वेलकम कर रहा हो. सघन वन से आच्छादित रामायणकालीन दण्डकारण्य भी यही है कालांतर में गोंड़ राजाओं के शासनाधीन होने के बाद यह गोंड़वाना कहलाने लगा. इसी राजघराने की रानी दुर्गावती का नाम सर्वप्रचलित है.

अब हमारे लिये आह्लादकारी बेला थी चूंकि हम टाईगर रिजर्व के प्रवेशद्वार मोहर्ली पहुंच गये. 
बस यहीं तक हमारी इनोवा जा सकती है इसके बाद वन विभाग की अनुबंधित जिप्सी से ही आगे का सफ़र शुरु होता है.  विभाग ने हमें जंगल सफारी के लिये गाईड उपलब्ध कराया.  अरे! अलसुबह लालबत्ती वाहन किसकी है? गाईड शंकर गेडाम ने बताया कि वह विधान सभा चुनाव ड्यूटी में आए आब्जर्वर की गाड़ी है जिन्हे व्याघ्र प्रकल्प देखने का जुनून यहां  खिंच लाया है.

जिप्सी सैलानियों को लेकर निकल पड़ी 625 वर्ग किलोमीटर में फैले 60 बाघों और 23 तेन्दुओं के सुदुर साम्राज्य की ओर ताबड़-तोड़. वोओओओ... गाईड ने नीरवता तोड़ते हुए आवाज लगाई, हमारी जिप्सी हिचकोले खाते हुए रुकी मेरी घिग्घी बंध गई और मैने पूछा क्या बाघ है? गाईड ने कहा- नहीं पानी के नाले के पास देखिये वह है 200 में से एक नील गाय. अरे यार! यह भी कोई चौकाने वाली बात है? गाईड शंकर ने कहा कि साब  यहां हर प्राणी महत्वपूर्ण है.  250 जंगली कुत्ते भी हैं यहां जब वे हुजुम में चलते है न! तब जंगल का राजा उनके सामने भीगी बिल्ली बन जाता है. 
खैर हम आगे निकल पड़े किंग आफ फॉरेस्ट की तलाश में.   बहुत सुकुन और आनन्दमय पल को मैं जी रहा था. जंगल की हरियाली के बीच पंछियों की सुमधुर कलरव जिसकी यहां 280 प्रकार की प्रजातियां हैं और वनमार्ग के दोनों ओर चौकड़ी भरते चीतल जिनकी संख्या यहां 1700 है और 600 सांभर . हमारा रास्ता काटते नेवला, भालु, जंगली गौर तो कभी खरगोश. जब वन्य प्राणी रास्ते को पार करता तो हमारी जिप्सी रोक ली जाती थी जानवरों को प्राथमिकता है न! उनका यह अभ्यारण्य जो है .

महाराष्ट्र का यह दूसरे नम्बर का टाईगर रिजर्व है यह जिसे 1995 में दर्जा दिया गया था इसे पहले 1935 में अभ्यारण्य बनाया गएा  था. प्रदेश में इसे मिला कर कुल छ: टाईगर रिजर्व है. मादा बाघ एक बार में दो से चार शावकों को जन्म देती है एवम् दो वर्षों के बाद उन्हें मुक्त कर देती है बाद में एक वर्ष तक शावक एक साथ रहने के बाद अपने पृथक इलाके में चले जातें हैं.  एक बाघ का साम्राज्य लगभग चालीस किमी तक का होता जहां उसकी सत्ता चलती है.  बड़े पैमाने पर शिकार होने की वजह से बाघ की संख्या काफी कम हो गई है वरना उनके दहाड़ की अनुगूंज से जंगल सदैव गुलज़ार रहता. 

बहरहाल हम ढूंढ रहे जंगल के सम्राट को और वे सुदुर वनप्रांतर में विश्राम फरमा रहें हैं.  सूर्य की रोशनी तेज होने के साथ उनके दर्शन की अभिलाषा अब कमतर होने लगी और हम निराश निढाल वापस लौटने लगे.  बाघ से मुलाकात भी किस्मत की बात है वरना कल ही तो सैलानियों ने उसे ताडोबा झील के पास पानी पीते अठखेलियां करते देखा था. ताडोबा आदिवासियों के आराध्य का नाम है.  गाईड शंकर गेडाम ने बताया कि समूह में यहां 19 बाघ एक साथ देखे गये. वे सैलानी खुबकिस्मत होंगे जिन्होंने इस रोमांचक दृश्य को देखा होगा हम तो अदद एक बाघ को देखने तरस गये. वैसे गाईड ने यह भी बताया कि टाईगर रिजर्व की सैर के लिये गर्मी सर्वाधिक उपयुक्त मौसम होता है.

Tuesday, October 7, 2014

चांद का घर चन्द्रपुर

चांद का घर चन्द्रपुर -

माँ महाकाली विराजती हैं यहां, महाराष्ट्र का प्रमुख एतिहासिक शहर है चन्द्रपुर यानि कि चांद का घर.  प्रकृति की गोद में बसे शहर के ईर्दगिर्द वन्यजीव अभ्यारण्य है.यह गोड़ वंशिय राजाओं की राजधानी रही है.

आज हमें माँ के दर्शन का परम सौभाग्य मिला.  मंदिर में माँ के प्राचीन दिव्य स्वरुप को देखकर धन्य हो गये हम सभी.  सप्तशती के दो- चार मंत्रों के साथ मातारानी की मैनें पूजा अभ्यर्थना की.पुरातत्व विभाग के अधीन होने की वजह से मंदिर अपने प्राचीन रुप में ही विद्यमान है.

मंदिर के गर्भगृह में महाकाली की विश्राम स्थली है, जहां वे शयन करतीं हैं.  संकरी सीढ़ियों से रेंगकर गर्भगृह में ऊतर कर मातारानी को शयनमुद्रा में देखना अलौकिक आनन्द से कम नहीं है.

Sunday, August 24, 2014

डबल डेकर और पीहर की महक.....

खूब भ्रमण हो गया मुंबई का .....अब चलें बड़ोदा।  बोरीवली स्टेसन पर इतजार है मुंबई से अहमदाबाद जाने वाली डबलडेकर ट्रेन का।  साढ़े चार घटे का सफ़र है। भागता-दौड़ता महानगर है मुंबई, लोग लोकल ट्रेन से उतर-चढ़ रहें हैं, एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म भीड़ और भीड़।  किसी को सांस लेने का टाईम नहीं हैं। बड़ोदा हम रात्रि 7:30 बजे पहुँच जायेंगे। प्लेट्फार्म नंबर 4 पर सी/8 का स्टेटस् बताने के कुछ देर बाद ही ट्रेन आ गयी।  वाह! डबल डेकर के ऊपरी फ्लोर पर हमारी सीट रिज़र्व हुई है।  

और शुरू हुआ रोमांचक सफर।  बहुत आरामदायक यात्रा महसूस हो रही है।  केटरर ने आवाज लगानी शुरू की अमूल कुल ...कूल-कूल।  गुजरातियों की प्रिय ट्रेन हो गयी है यह जबकि पिछले साल ही इसका परिचलन शुरू हुआ है।  भोगौलिक और सांस्कृतिक, आर्थिक रूप से गहरा रिश्ता है गुजरात-मुंबई का।  सही अर्थों में कहा जाये तो मुंबई की आर्थिक बुनियाद गुजरातियों ने ही रखी है।  फुल एसी ट्रेन मैं फुल एंटरटेनमेंट है गुजराती में हास परिहास चल रहा है।  ऐसा महसूस हो रहा है ज्यों मैं लोकप्रिय टीवी सिरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा देख रहा हूँ।  कोई वाट्स एप्प पर चैटिंग में तो कोई फेसबुक पर बिजी है । वो आग्रह कर रही है- दरिया नुं फोटु खिंचो न! मोटा भाई, और १२ मेगापिक्सल के नये स्मार्ट कैमरे से मोटा भाई ट्रेन की खिड़की से दरिया  की सटासट फोटो खिंचने में मगन है।  

६३ हजार करोड़ की बुलेट ट्रेन मुबई-अहमदाबाद इसी रुट पर, चलाने संसद ने बजट पास कर दिया है।  जब चलेगी भाई साब तब चलेगी फिलहाल हम तो जीवन में पहली बार डबल डेकर ट्रेन का आनन्द भरुच का सिंगदाना खाते हुए उठा रहें हैं। मेरी भाग्यवान मुग्ध है पीहर की महक से। फिर खिलखिलाने लगी बगल के जोड़े की गुजराती में बात सुनकर। मैने पूछा क्या हुआ? जवाब मिला नईनवेली बोल रही है चिमनभाई तुम खाखरा पानी का डिब्बा बंद करो वरना बरोड़ा की जगह आणद पहुंच जाओगे.....अरे चलो किनारे बरोड़ा आने को है। मेरी बिटिया ने कहा मामाजी की नैनो स्टार्ट नहीं हुई।  हां-हां कोई बात नहीं नीतु, हम टेक्सी से घर चले जायेंगे। लो हो गया डबल डेकर का सुहाना सफर पूरा।

Friday, August 22, 2014

त्र्यम्बकेश्वर यात्रा

त्रयंबकेश्वर य।त्रा

                      निकले तो बूंदाबांदी का मौसम था.... घाट की चढ़ाई शुरु होते ही प्रक्रति अपना रंग बिखेरने लगी।  वैसे भी हम मैदानी लोगों को जंगल, पहाड़, झरने और झाड़-झंखाड़ बहुत आकर्षित करतें हैं।  ज्यों-ज्यों हम ऊंचाई पर पहुंचने लगे तो मौसम भी करवट लेने लगा।  पेड़ की डगांले झूलने लगी और ब्रह्मगिरी पर्वत पर अब बादल खिलने लगे।  दिन के साढ़े दस बजे हैं सुबह का उजास मद्धम होने लगा।  ये लो बारिश शुरु हो गई पर्वतमालाओं पर खिले श्याम मेघ झमाझम बरसने लगे।  बादलों कें अंधेरे खोह से जब गुजरना मुश्किल हुआ तो हमने गरम चाय का आनन्द लेने गाड़ी रोक ली।

                      मौसम सामान्य होने पर हम पुन: निकल गये महर्षि गौतम की तपोभूमि त्रयंबकेश्वर की ओर।  पवित्र गोदावरी कुण्ड के पास अवस्थित ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वरजी के देवालय परिसर पर पहुंचे तो विशाल जन सैलाब कमोबेश ऐसी भीड़ तो सावन के महिने में ही आमतौर पर उमड़ती है, जबकि अब तो भादौ मास लग चुका है।  पंडितजी ने जिग्यासा शांत कि मराठी पंचांग के अनुसार हम पन्द्रह दिन पीछे चलतें हैं।  कालसर्प योग की शांतिपूजा के लिये पूरे देश और परदेश से भगत त्रयंबकेश्वर की ही शरण में आते हैं। हां एक और खासियत यहां की यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देंव एक साथ विराजे हुए हैं इसलिये मंदिर के गर्भग्रिह में स्त्रीयों का प्रवेश निषेध है।