Saturday, October 25, 2014

माँ खादी की चादर दे दे...


समाज का अभिजात्य वर्ग जिस खादी को पहिनने में अपनी शान समझता था अब वह खादी विलुप्त होने की कगार पर है।  गाँधी जयंती पर छुट दिए जाने के बावजूद़ अब उसका कोई लेवाल नहीं है।  नेताओं ने भी खद्दर से मुँह मोड़ लिया है।  सही अर्थों में कहा जाय तो खादी को लिनेन के वस्त्र ने निगल लिया।

एक जमाना था जब झक्कास खादी के कपड़े पहना कोई व्यक्ति सामने दिख जाता तो आदर और श्रद्धा से सिर झुक जाता था।  वस्तुत: उन दिनों खादी और चरखा शुचिता, विचार और जनांदोलन का परिचायक था।  वह स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का बोध था। अब तो विशिष्ट लोग बाग लिनेन के महँगे कपड़ों के दीवाने हो गये हैं और इसे ही धारण करने में अपनी शान समझने लगें हैं। अरे! खादी पहिना है? इस खादी के प्रति अब लोगों का दोयम दर्जा हो गया है।

मुझे स्मरण है जब मैं स्कूली छात्र था तब अंचल के सुप्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी महाबीर प्रसाद जी शर्मा, मेरे ताऊ जी के संयोजन में ग्राम शिल्प के ज़रियेे नैला में खादी भंडार खुला था तब वह समाज के शिष्ट वर्ग में आकर्षण का केंद्र हुआ करता था।  जांजगीर तहसील भर के लोग खादी के कपड़ो की खरीदी के लिये यहाँ आया करते।  ग्रामीण क्षेत्र में चरखा केंद्र चलते थे।  दिन भर ग्रामशिल्प द्वारा संचालित खादी भंडार में ग्राहकों और  चरखा केंद्र के स्वयम सेवको की गहमा गहमी रहा करती। इन चरखा केन्द्रों के जरिये लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार मिला हुआ था।

नेताओं और समाज के अभिजात वर्ग की खास पोशाक हुआ करती थी खादी। हम स्कूली बच्चे उन दिनों एक गीत गाया करते थे माँ खादी की चादर दे दे मैं गाँधी बन जाऊँ, सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गाऊं....।दीपावली के पूर्व दो अक्टूबर गाँधी जयंती का खादी प्रेमियों का इंतजार रहता था चूँकि इस दिन से एक माह के लिये खादी के कपड़ों की खरीद पर विशेष छुट हुआ करती है जो आज पर्यन्त जारी है।  पर अब किसी को इस छुट से कोई सरोकार नहीं है।

ऐसा नहीं है कि इस पखवाड़े में कोई खरीददारी नहीं होती।  होती है और जोरदार होती है किन्तु अब लिनन के महंगे वस्त्रों की होती है।  अब नेताओं को आर्थिक आज़ादी स्वदेशी आत्मनिर्भरता जैसे मूल्यों से कोई मतलब नहीं है न ही गाँधी दर्शन से। स्वदेशी विचार अब जमींदोज हो गये लिनन के विदेशी धागों से बने कपड़े लोगों के स्टेट्स सिंबल बन गये! कुटीर उद्योग, गाँव में रोजगार सृजन की चिंता किसे है? लिनन ने निगल लिया अब खादी-चरखा और गाँधी के विचार क्रांति अभियान को।

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