चला वाघांच्या साम्राज्यात....
आये तो चन्द्रपुर थे किंतु हम निकल पड़े जंगल के राजा का साम्राज्य देखने. दरअसल सुबह अखबार पलट कर देखा तो वन्य प्राणियों की खबरों ने हमें ताडोबा-अंधारी टाईगर रिजर्व देखने आकृष्ट किया. पहली खबर थी जंगल से भटक कर गांव व शहर पहुंचे 5 तेंदुए और एक बाघिन भोपाल के उद्यान में भेजे जायेंगे. दूसरी खबर थी समीपस्थ ग्राम लोहारा में विगत कुछ दिनों से बाघ की दहशत के कारण लोगों का जीना हराम हो चुका है. किसान खेतों में जाने से कतराने लगे हैं. तीसरी खबर थी वन्यजीव सप्ताह के उद्घाटन के संबंध में. सो हमने अपने निर्धारित सेड्यूल से समय निकाल कर टाईगर रिजर्व की सैर करने की योजना बनाई.
पौ फटते ही हम तैयार हो कर ताडोबा के मेन गेट मोहर्ली की ओर प्रस्थित हुए. अब वन प्रांतर दिखने लगा था. इनोवा की खिड़की खोलते ही ठण्डी हवा के झोकों ने हमारी आंखों के उनींदेपन को दूर कर दिया. वन मार्ग के दोनों ओर विशाल और हरे भरे पेड़ ऊपर नीले व रक्ताभ आसमान पर सूर्ख लाल सूरज जानों हमें व्याघ्र प्रकल्प की ओर से वेलकम कर रहा हो. सघन वन से आच्छादित रामायणकालीन दण्डकारण्य भी यही है कालांतर में गोंड़ राजाओं के शासनाधीन होने के बाद यह गोंड़वाना कहलाने लगा. इसी राजघराने की रानी दुर्गावती का नाम सर्वप्रचलित है.
अब हमारे लिये आह्लादकारी बेला थी चूंकि हम टाईगर रिजर्व के प्रवेशद्वार मोहर्ली पहुंच गये.
बस यहीं तक हमारी इनोवा जा सकती है इसके बाद वन विभाग की अनुबंधित जिप्सी से ही आगे का सफ़र शुरु होता है. विभाग ने हमें जंगल सफारी के लिये गाईड उपलब्ध कराया. अरे! अलसुबह लालबत्ती वाहन किसकी है? गाईड शंकर गेडाम ने बताया कि वह विधान सभा चुनाव ड्यूटी में आए आब्जर्वर की गाड़ी है जिन्हे व्याघ्र प्रकल्प देखने का जुनून यहां खिंच लाया है.
जिप्सी सैलानियों को लेकर निकल पड़ी 625 वर्ग किलोमीटर में फैले 60 बाघों और 23 तेन्दुओं के सुदुर साम्राज्य की ओर ताबड़-तोड़. वोओओओ... गाईड ने नीरवता तोड़ते हुए आवाज लगाई, हमारी जिप्सी हिचकोले खाते हुए रुकी मेरी घिग्घी बंध गई और मैने पूछा क्या बाघ है? गाईड ने कहा- नहीं पानी के नाले के पास देखिये वह है 200 में से एक नील गाय. अरे यार! यह भी कोई चौकाने वाली बात है? गाईड शंकर ने कहा कि साब यहां हर प्राणी महत्वपूर्ण है. 250 जंगली कुत्ते भी हैं यहां जब वे हुजुम में चलते है न! तब जंगल का राजा उनके सामने भीगी बिल्ली बन जाता है.
खैर हम आगे निकल पड़े किंग आफ फॉरेस्ट की तलाश में. बहुत सुकुन और आनन्दमय पल को मैं जी रहा था. जंगल की हरियाली के बीच पंछियों की सुमधुर कलरव जिसकी यहां 280 प्रकार की प्रजातियां हैं और वनमार्ग के दोनों ओर चौकड़ी भरते चीतल जिनकी संख्या यहां 1700 है और 600 सांभर . हमारा रास्ता काटते नेवला, भालु, जंगली गौर तो कभी खरगोश. जब वन्य प्राणी रास्ते को पार करता तो हमारी जिप्सी रोक ली जाती थी जानवरों को प्राथमिकता है न! उनका यह अभ्यारण्य जो है .
महाराष्ट्र का यह दूसरे नम्बर का टाईगर रिजर्व है यह जिसे 1995 में दर्जा दिया गया था इसे पहले 1935 में अभ्यारण्य बनाया गएा था. प्रदेश में इसे मिला कर कुल छ: टाईगर रिजर्व है. मादा बाघ एक बार में दो से चार शावकों को जन्म देती है एवम् दो वर्षों के बाद उन्हें मुक्त कर देती है बाद में एक वर्ष तक शावक एक साथ रहने के बाद अपने पृथक इलाके में चले जातें हैं. एक बाघ का साम्राज्य लगभग चालीस किमी तक का होता जहां उसकी सत्ता चलती है. बड़े पैमाने पर शिकार होने की वजह से बाघ की संख्या काफी कम हो गई है वरना उनके दहाड़ की अनुगूंज से जंगल सदैव गुलज़ार रहता.
बहरहाल हम ढूंढ रहे जंगल के सम्राट को और वे सुदुर वनप्रांतर में विश्राम फरमा रहें हैं. सूर्य की रोशनी तेज होने के साथ उनके दर्शन की अभिलाषा अब कमतर होने लगी और हम निराश निढाल वापस लौटने लगे. बाघ से मुलाकात भी किस्मत की बात है वरना कल ही तो सैलानियों ने उसे ताडोबा झील के पास पानी पीते अठखेलियां करते देखा था. ताडोबा आदिवासियों के आराध्य का नाम है. गाईड शंकर गेडाम ने बताया कि समूह में यहां 19 बाघ एक साथ देखे गये. वे सैलानी खुबकिस्मत होंगे जिन्होंने इस रोमांचक दृश्य को देखा होगा हम तो अदद एक बाघ को देखने तरस गये. वैसे गाईड ने यह भी बताया कि टाईगर रिजर्व की सैर के लिये गर्मी सर्वाधिक उपयुक्त मौसम होता है.
चुनावी मौसम का फ़ायदा उठा रहे हो भाई साहब :)
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